स्वामित्व योजना : बदलेगी गॉंव की सूरत


एक अच्छी सरकार से सिर्फ इतनी ही अपेक्षा नहीं होती कि वो रोजमर्रा के शासन  को औपचारिक ढंग से चलाती रहे, बल्कि उससे एक बेहतर भविष्य की कल्पना से प्रेरित अग्रसक्रिय कदम उठाते रहने की भी आशा रहती है। खासकर, एक ऐसे देश में जो अभी विकास के उस पायदान पर हो जहॉं से बहुत तेज़ी से आगे बढ़ने की संभावना हो वहॉं सरकार से ऐसी सक्रियता की अपेक्षा और बढ़ जाती है। और जब हम बेहतर भविष्य की कल्पना से प्रेरित कदम की बात करते हैं तो इसका प्रधान आशय संसाधनों के सर्वाधिक बेहतर उपयोग से होता है। अर्थात् भौतिक व मानव संसाधन का इस प्रकार प्रबंधन किया जाए कि देश की उन्नति में अधिकतम ऊर्जा का निवेश हो सके। यह दो तरीकों से हो सकता है। मानव संसाधन के लिए एक शांतिपूर्ण समाज की स्थापना करके, और इसके लिए ‘संघर्ष समाधान’ की बेहतर युक्ति प्रस्तुत करना। इस बिंदु को थोड़ा और स्पष्ट करें तो इसका अर्थ है कि यदि सरकार सामाजिक विवादों को यथासंभव कम कर दे और विवादों के निपटान की प्रक्रिया को आसान बना दे तो शांतिपूर्ण समाज की स्थिति को हासिल किया जा सकता है। इस प्रकार मानव संसाधन की जो ऊर्जा आपसी टकराव में नष्ट होती है वो उत्पादक कार्यों में निवेश होने लगेगी। दूसरा तरीका यह है कि भौतिक संसाधनों की स्थिति इस प्रकार निश्चित किया जाए कि वो ‘अनुपयुक्त’ न रह जाते हों। इससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है। अब, इन दोनों ही संदर्भों में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई ‘स्वामित्व'(SVAMITVA) योजनाओं को देखते हैं कि इनके कितने अनुकूल हैं।

सबसे पहले अगर यह देखें कि स्वामित्व योजना है क्या तो यह दरअसल एक संपत्ति कार्ड है जो उसके असली धारक को प्रदान की जाएगी। यह एसएमएस के माध्यम से संबंधित व्यक्ति तक भेजा जाएगा और फिर राज्य सरकारें भौतिक रूप से इसे वितरित भी करेंगी। पहली नजर में यह कौतूहल का विषय हो सकता है कि किसी धारक को उसकी संपत्ति का कार्ड देने का क्या औचित्य है? इस पर तो वैसे भी उसका दावा होता ही है, लेकिन ग्रामीण भारत की बहुत सारी जमीनों को लेकर ऐसी बात नहीं कही जा सकती। वस्तुतः गॉंवों में ऐसे भू-खंडों की बहुतायत है जिसके मालिकाना हक को लेकर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं है। इसे आबादी इलाका भी कहा जाता है। इन भू-खंडों के स्वामित्व का व्यावहारिक निर्धारण आमतौर पर इससे होता है कि यह पीढ़ियों से किसके पास रही है, जबकि उनके पास भी इसके स्वामित्व का कागजी प्रमाण नहीं होता। इसके अलावा इससे जुड़ी एक और समस्या यह है कि ठीक उसी भूमि पर कोई और व्यक्ति भी दावा कर रहा होता है। इससे उत्पन्न विवाद अक्सर इतने विस्तृत हो जाते हैं कि न्यायालय तक मामले पहुँच जाते हैं। इस प्रकार इस अनिश्चितता से एक सामाजिक तनाव तो पैदा होता ही है साथ ही उस भूमि की आर्थिक गतिविधियों में हिस्सेदारी भी गौण हो जाती है। फिर चूँकि इन भू-खंडों का कोई कानूनी आधार निश्चित नहीं होता इसलिए इनसे राज्य को भी इनसे कर आदि की प्राप्ति नहीं हो पाती। कुल मिलाकर यह ग्रामीण भारत की एक जटिल समस्या बन गई है।

अब अगर इस स्थिति पर विचार करें कि क्या हो अगर इसका समाधान कर दिया जाए?

इसका पहला लाभ तो यही होगा कि प्रत्येक भू-खंड का कानूनी अधिकार निश्चित होगा और राज्य के पास अपने संसाधनों का ठीक-ठीक हिसाब रहेगा। दूसरा लाभ यह है कि इससे सामाजिक तनाव में कमी आएगी और सह-अस्तित्व की भावना विकसित होगी। इसका तीसरा लाभ यह है कि इस प्रकार जिन्हें भी मालिकाना हक प्राप्त हो जाता है वो इसके आधार पर व्यवसाय आदि हेतु बैंक लोन ले सकते हैं।

इससे यह एक जीवित संसाधन में तब्दील हो जाएगा। इसी से जुड़ा चौथा लाभ है कि राज्य को कर आदि के रूप में कुछ न कुछ प्राप्त होने लगेगा तथा वो इसका रेट आदि तय कर सकते हैं। न्यायालयों पर से मुकदमों के भार का कम होना, इसके अन्य लाभ के रूप में देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर कहें तो एक इस निर्णय से ग्रामीण भारत की पूरी स्थिति बदली जा सकती है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से इसके लिए ‘स्वामित्व’ योजना की शुरुआत की तो फिर इस बदलाव ने मूर्त रूप ले लिया। उपरोक्त बिंदुओं से यह स्पष्ट है कि स्वामित्व योजना किस प्रकार ग्रामीण भारत की बेहतरी में मददगार है।

आश्चर्य की बात है यह ज़रूरी समाधान इतने दिनों से सिर्फ इसलिए नहीं हो पा रहा था क्योंकि ऐसे विवादित भूमि की नापी करना और इस आधार पर उसके मालिक का निर्धारण करना एक ‘खर्चीली’ योजना थी। किंतु वर्तमान सरकार ने इसके लिए अलग बजट की व्यवस्था करते हुए इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकारों और पंचायतों को हिस्सेदार बनाया। चूँकि कानून व्यवस्था और भूमि राज्य के हिस्से आते हैं तो इसमें राज्य की भूमिका भी प्रभावी होनी चाहिए तथा ग्रामीण भारत का प्रबंधन पंचायतों से बेहतर कौन कर सकता है।

इस संदर्भ में एक बहुआयामी नीति के तहत गॉंव तथा वहॉं की भूमि का सर्वेक्षण किया जाएगा तथा ड्रोन के माध्यम से इसकी मापी की जाएगी। यह प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भूमि सत्यापन का कार्य अत्यंत आसान हो जाएगा। इसके बाद जिस भी भू-खंड पर एक से अधिक व्यक्ति मालिकाना हक का दावा करेगा, ड्रोन सर्वेक्षण और सरकारी रिकार्ड के मिलान से उसका विनिश्चयन कर दिया जाएगा।

इस विनिश्चयन की सूचना पोर्टल पर डाल दी जाएगी जहाँ से संबंधित व्यक्ति इस संपत्ति अधिकार के कार्ड को प्राप्त कर सकता है। यह पूरी प्रक्रिया भू रिकॉर्ड को पारदर्शी बनाएंगी।

आज ग्रामीण भारत को तकनीक से जोड़ना एक जरूरी पहल है, और इस तकनीक के माध्यम से विकास की नई कहानी लिखना उसकी तार्किक परिणति। यह खुशी की बात है कि केंद्र सरकार इसे समझ रही है और इस पर अमल भी कर रही है।

(लेखक इतिहास के अध्येता हैं तथा विभिन्न अखबारों तथा ऑनलाइन पोर्टल के लिए नियमित लेखन करते हैं।)

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