नए भारत का नया दस्तावेज : नई शिक्षा नीति


वर्तमान युग पहले के किसी भी समय से कहीं अधिक गतिशील है। वैसी तमाम व्यवस्थाएँ जो पहले बहुत स्थाई किस्म की प्रतीत होती थीं, वो आज परिवर्तन की राह पर हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से लेकर राजनीतिक संरचना और अर्थव्यवस्था का रूप, इन सभी के आयाम इतनी तीव्रता से बदल रहे हैं कि अगर इनकी गति से साम्य नहीं बैठाया गया तो पीछे छूटना तय है। ऐसे में आवश्यक है कि हम एक नागरिक और एक राष्ट्र के रूप में इतने तैयार हों कि इन परिवर्तनों को अपने अनुकूल साध सकें। इस उद्देश्य की प्राप्ति में जो सबसे बड़ा उपकरण काम आता है वो है – शिक्षा। आज के ज्ञान समाज में इससे शक्तिशाली कुछ भी नहीं है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि हर राज्य इसके माध्यम से स्वयं को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है और इससे संबंधित नीति बनाता है। यह नीति ही यह बताती है कि किसी राज्य की तैयारी क्या है और वो भविष्य में कैसा आकार लेगा।

अब, भारतीय संदर्भ की बात करें तो यह अभी 1986 में निर्मित शिक्षा नीति से ही संचालित होता रहा है। स्वाभाविक सी बात है कि इन 34 वर्षों में समय ने कई करवटें बदली हैं इसलिए आगे की रणनीति भी इसी अनुरूप होनी चाहिए। इसी क्रम में वर्तमान सरकार ने जून 2017 में पूर्व इसरो प्रमुख ‘के. कस्तूरीरंगन’ की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जिसने 2019 में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ का मसौदा प्रस्तुत किया। फिर सरकार ने इस मसौदे पर देशभर से सुझाव आमंत्रित किए और उसके आधार पर ‘नई शिक्षा नीति -2020’ जारी किया। अब अगर हम इस नीति का मूल्यांकन करें तो मूलतः चार कसौटियॉं बनती हैं, जिसके आधार पर हम इसके उचित अनुचित होने के निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं। इसमें पहली कसौटी है – यह शिक्षा के सर्वसुलभ होने पर कितना जोर देता है; दूसरी कसौटी शिक्षा और समाज की अंत:क्रिया है, तीसरी कसौटी में हम नवाचार को प्रोत्साहित करने की आकांक्षा को परख सकते हैं और अंतिम कसौटी यह हो सकती है कि शिक्षा नीति आर्थिक अपेक्षाओं से किस प्रकार का संबंध रखती है। आइये बारी बारी से इन चारों पक्षों पर गौर करते हैं।

सर्वसुलभ शिक्षा और नई शिक्षा नीति 

सबको शिक्षा मिले यह न केवल प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है बल्कि यह किसी भी राष्ट्र के उत्थान की बुनियादी शर्त भी है। सिद्धांत के तौर पर देखें तो इसे पूर्व में ही अपनाया जा चुका है जब 86वें संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया। फिर 2009 में ‘नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम’ के माध्यम से इसे क्रियान्वित भी कर दिया गया। अब सवाल है कि नई शिक्षा नीति यहॉं से कितनी आगे बढ़ी है और कहॉं तक जाने की इच्छा रखती है?

नई शिक्षा नीति इस अधिकार को और अधिक व्यापक बनाती है। वस्तुतः अभी तक राज्य 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा देने के लिए कटिबद्ध है। वर्तमान नीति के माध्यम से राज्य ने इसे 3 से 18 वर्ष तक विस्तारित करने की बात कही गई है। यह एक प्रभावशाली कदम है। इस संदर्भ में नई शिक्षा नीति ‘प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा’ (ECCE) की बात करती है। इसका उद्देश्य बच्चों को स्कूल जाने के लिये तैयार करना है। यानी 6 वर्ष की अवस्था में सीधे कक्षा -1 में नामांकन करा देने की बजाय सरकार तीन वर्ष की अवस्था से ही बच्चों को इस तरह तैयार करेगी कि वो मानसिक रूप से इसके प्रति सहज हो जाएँ। इसके लिए आँगनबाड़ी व अन्य समर्थ संस्थानों की मदद ली जाएगी। यह परिवर्तन न केवल शिक्षा को और अधिक आकर्षक बनाएगा बल्कि गरीब व कमजोर परिवारों को बेहतर परवरिश का विकल्प भी पहुँचाएगा।

सर्वसुलभ शिक्षा के संदर्भ में इस शिक्षा नीति का दूसरा जोर बेहतर क्रियान्वयन और संसाधनों के अनुकूल उपयोग पर है। इसके तहत कुछ प्राथमिक लक्ष्य तय किए गए हैं, जैसे- 2030 तक प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर पर 100 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात को प्राप्त करना, ड्रॉप आउट अनुपात को कम करना खासकर 5वीं और 8वीं कक्षा के बाद स्कूल छूटने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना, शिक्षक -विद्यार्थी अनुपात को कम से कम 30:1 पर लाना तथा वंचित क्षेत्र में इस अनुपात को 25:1 करना। ये सभी ऐसे लक्ष्य हैं जिनसे सबको शिक्षा व्यावहारिक रूप से लागू हो पाएगा। इसके अतिरिक्त बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हेल्थकार्ड व बेहतर पोषण के लिए मध्याह्न भोजन के साथ नाश्ते के भी प्रबंध की बात की गई है। संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग के लिए ‘क्लस्टर आधारित उपयोग’ को इसमें बढ़ावा दिया गया है। इसका अर्थ है कि एक निश्चित क्षेत्रफल के अंतर्गत आने वाले स्कूल पुस्तकालय, प्रयोगशाला व खेल के मैदान आदि आपस में साझा करें। इससे न केवल सामूहिकता बढ़ेगी बल्कि इन संसाधनों का बेहतर क्रियान्वयन भी संभव हो पाएगा। अत: हम कह सकते हैं कि वर्तमान शिक्षा नीति सर्वसुलभ शिक्षा पर काफी गंभीरता से विचार करती है।

नई शिक्षा नीति और समाज 

एक बेहतर और उपयोगी शिक्षा को परखने का एक निर्धारक यह भी कि वो अपने समाज से कितनी जुड़ी है। समाज से कटी हुई शिक्षा कुछ और हो सकती है समावेशी और उपयोगी नहीं हो सकती। इस संदर्भ में नई शिक्षा नीति काफी सचेत और संतुलित नज़र आती है। इसकी पुष्टि के लिए कुछ प्रावधानों को देखते हैं। सबसे पहले नई शिक्षा नीति पर जोर देती है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाए। यह नीति 5वीं कक्षा तक अनिवार्य रूप से और इसे 8वीं तक विस्तारित करने की अपेक्षा करती है। मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित करने का सीधा सा तात्पर्य यही है कि इससे न केवल बच्चे अधिक तेजी से और बेहतर ढंग से सीख पाएंगे बल्कि वो अपने समाज और संस्कृति से निकट साम्य स्थापित कर पाएंगे।

भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं होती बल्कि वो सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता का वाहक भी होती है। अत: यह प्रयास निश्चित ही शिक्षा को समाज से जोड़े रखेगा। इसके अलावा विभिन्न भारतीय भाषाओं को सीखने के लिए इसमें ‘त्रिभाषा फॉर्मूला’ को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है ताकि हम देश के भीतर के अनेक समाजों को समझ सकें। साथ ही नई शिक्षा नीति समाज को शिक्षण प्रक्रिया में शामिल होने के लिए भी आंमत्रित करती है तथा हर वयस्क साक्षर से यह अपेक्षा करती है कि वो इसमें दिलचस्पी दिखाए। पाठ्यक्रम के स्तर पर भी  केंद्रीय जरूरतों के साथ ‘स्थानीय संदर्भ’ पर विशेष बल दिया गया है। इसके अतिरिक्त अनेक जगहों पर समाज से जुड़ने की बात की गई है। इस लिहाज से देखें तो यह नीति समाजोन्मुख प्रतीत होती है।

नई शिक्षा नीति  में नवाचार के प्रति आग्रह 

आमतौर पर नवाचार को किसी ऐसे चमत्कार की तरह देखा जाता जो अनायास ही अस्तित्व में आ गया हो, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। नवाचार एक प्रवृत्ति है जो अपने परिवेश को ठीक से समझने पर और फिर उसे एक नई दिशा देने की कोशिश से विकसित होती है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था जितनी अधिक परिवेश सापेक्ष, खुली और लचीली होगी वो नवाचार को उतना ही अधिक प्रोत्साहित करेगी। एक निश्चित पाठ्यक्रम को तैयार कर अधिक अंक लाने की प्रविधि में नवाचार का विकास बहुत मुश्किल है क्योंकि इसमें सीखने पर कम और रटने पर अधिक बल दिया जाता है।

इस संदर्भ में नई शिक्षा नीति एक व्यापक रणनीति को संबोधित करती है जो स्कूली शिक्षा से ही सीखने पर अधिक बल देती है। इसमें कहा गया है कि परीक्षा पर न्यूनतम आश्रित हुआ जाए और पाठ्यक्रम को भी इतना लचीला बनाया जाए कि विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुरूप आगे बढ़ें। इसके लिए शिक्षण की व्यावहारिक पद्धतियों को अधिक से अधिक अपनाने की बात की गई है ताकि शिक्षा और परिवेश का प्रत्यक्ष संबंध स्थापित हो।

स्कूली शिक्षा के अलावा अगर उच्च शिक्षण संस्थानों को देखें तो उनसे अनुसंधान और नवाचार की अधिक अपेक्षाएँ होती हैं। वस्तुतः भारत को पोषणयुक्त भोजन व बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता व पर्यावरण जैसे व्यापक क्षेत्रों में आगे बढ़ने की जरूरत है। यह तभी हो पाएगा जब हमारे शिक्षण संस्थान समाधानमूलक नवाचार की ओर बढ़ें। आज जहॉं इजराइल और दक्षिण कोरिया जैसे देश अनुसंधान व नवाचार पर जीडीपी का 4 प्रतिशत से अधिक खर्च कर रहे हैं वहीं भारत सिर्फ 0.69 प्रतिशत ही खर्च कर रहा है। नई शिक्षा नीति इसमें बढ़ोतरी की बात करता है। साथ ही उच्चतर शिक्षण संस्थानों को कला, समाज एवं विज्ञान के समुच्चय के रूप में विकसित करने की वकालत करता है ताकि समझ अधिक समावेशी हो और नए आचार-विचारों की ओर आग्रह बढ़े। इस संदर्भ में शिक्षण संस्थानों को और स्वायत्तता देने की बात की गई है।

आर्थिक अपेक्षाएँ और नई शिक्षा नीति 

भारत एक जनांकिकीय लाभांश वाला देश है। यानी इसके पास सबसे बड़ा युवा श्रम बल है जो देश को तेजी से आगे ले जा सकने की क्षमता रखता है। लेकिन ऐसा तब हो पाएगा जब ये युवा बेहतर कौशल से लैस हों तथा गतिशील आर्थिक गतिविधियों के प्रति सहज हों। इसलिए शिक्षा का एक रूप यह भी है कि वो अपने नागरिकों को कितना हुनरमंद बनाती है।

इस संदर्भ में नई शिक्षा नीति कहीं अधिक मुखर है तथा इस रूढ़ि को तोड़ने का आग्रह करती है जहॉं ‘व्यावसायिक शिक्षा’ को मुख्य धारा की शिक्षा से कमतर माना जाता है। ऑंकडों के हिसाब से देखें तो 19 से 24 वर्ष के आयुवर्ग वाले भारतीय कार्यबल में से मात्र 5 प्रतिशत लोगों ने व्यावसायिक शिक्षा हासिल की है जबकि अमेरिका, जर्मनी और दक्षिण कोरिया में यह दर क्रमशः 52,75 तथा 96 प्रतिशत है। अत: आवश्यक है कि व्यावसायिक शिक्षा के प्रति सहजता स्थापित की जाए। यह दस्तावेज इस बात पर जोर देता है कि व्यावसायिक शिक्षा को इस तरह अपनाया जाए कि यह क्रमशः मुख्य धारा की शिक्षा से मिल जाए। इसके लिए स्कूली स्तर से ही शुरुआत हो तथा प्रत्येक बच्चे को कम से कम एक व्यवसाय से जुड़े कौशलों को सिखाया जाए, जो कॉलेज और विश्वविद्यालय में क्रमशः अधिक घनीभूत होता जाए। इसमें 2025 तक कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को व्यावसायिक अनुभव प्रदान करने की इच्छा जताता है। सार रूप में कहें तो नई शिक्षा नीति व्यावहारिक शिक्षा और आर्थिक उपयोग की शिक्षा से मुंह नहीं चुराती।

कुल मिलाकर यह शिक्षा नीति राष्ट्रीय आवश्यकताओं को व्यापक रूप से संबोधित करती है। इसमें एक बेहतर भविष्य का सपना है और उसे पूरा करने के लिए जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की मंशा भी है। अब, इस नए भारत के दस्तावेज़ को प्रभावी ढ़ंग से क्रियान्वयन करने की आवश्यकता है।

(लेखक इतिहास के अध्येता हैं। विभिन्न अखबारों तथा ऑनलाइन पोर्टल्स के लिए नियमित लेखन। यह उनके निजी विचार है l)

छवि स्रोत: https://expressnews7.com

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