A discussion via video-conference on Discussion on "Towards New India, Towards Purvoday & West Bengal's Future" on Sunday, 31st May 2020 at 6 PM

पुण्यतिथि विशेष: श्यामाप्रसाद मुखर्जी कहते थे सचाई के लिए लड़ते हुए ही मेरा अंतिम समय आए


श्यामाप्रसाद मुखर्जी शायद अपने दौर के उन नेताओं में से थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में स्थान बना लिया था। मात्र 46 वर्ष की आयु में वह स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने थे

कुल 52 साल के छोटे से जीवन में भी डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की उपलब्धियां बहुत अधिक थीं। उनके जीवन की सबसे ऐतिहासिक पहल थी आज की भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन, भारतीय जन संघ, की स्थापना जिसने कई दशकों की यात्रा के बाद भारतीय राजनीति के तौर-तरीकों को बदल दिया है। उनकी दूरदर्शिता की झलक देने वाले इस लक्ष्य को मूर्त रूप देने के लिए वे लंबे समय तक बौद्धिक रूप से सक्रिय रहे थे। घोर तिरस्कार और प्रतिरोध के बीच मात्र 10 लोगों को साथ लेकर उन्होंने जिस विचार का बीज बोया था, वह आज कई दशकों के निरंतर संघर्ष के बाद भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित होकर 11 करोड़ सदस्यों की भागीदारी वाला ताकतवर धारा में बदल चुका है।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी शायद अपने दौर के उन नेताओं में से थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में स्थान बना लिया था। मात्र 46 वर्ष की आयु में वह स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने थे। इसी के साथ, वह अपने दौर में भविष्य की बातों को पहले ही जान सकने वाले ऐसे व्यक्ति भी थे जिसने हमेशा भारत के राष्ट्रीय हितों और उसकी एकता व अखंडता को अपनी राजनीति में सर्वोच्च महत्व दिया। कोलकाता समेत बंगाल के एक हिस्से को पश्चिमी बंगाल के रूप में भारत का अंग बनाए रखना सुनिश्चित करने के लिए उनका महान और युगांतरकारी प्रयास ऐसी महागाथा है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। बंगाली हिंदुओं को भारत के एक हिस्से में सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने का अवसर देने के इस प्रयास में उन्हें तत्कालीन बंगाल के सभी बुद्धिजीवियों तथा सभी राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं का व्यापक समर्थन मिला था। जदुनाथ सरकार, आरसी मजूमदार, उपेंद्रनाथ बनर्जी, सुनीति कुमार चटर्जी, और राधाकुमुद मुखर्जी जैसे उस युग के दिग्गज विचारकों, इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और सार्वजनिक हस्तियों ने बंगाल के एक हिस्से को भारत में बचाने रखने के लिए श्यामा प्रसाद के प्रयासों को आगे बढ़ कर एक स्वर से समर्थन दिया था।

इससे उनके लिए व्यापक समर्थन का पता तो चलता ही है, काफी आगे तक का सोच पाने की उनकी क्षमता तथा उनकी राजनीति की व्यावहारिकता का भी पता चलता है। अगस्त 1946 में जिन्ना की सीधे हमले (‘डायरेक्ट ऐक्शन’) की योजना को कोलकाता में अमली जामा पहनाने वाले बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एचएस सुहरावर्दी के प्रस्ताव पर जब शरत चंद्र बोस जैसे नेता भी एक ‘संप्रभु संयुक्त बंगाल’ के लुभावने सपने के जाल में फंस गए थे, तब भी श्यामा प्रसाद यह साफ समझ पा रहे थे कि यह बात बंगाली हिंदुओं को फंसाने और अंततः पूरे बंगाल को पाकिस्तान को सौंपने की शरारती चाल भर थी। निरंतर चले राजनीतिक और बौद्धिक आंदोलन के माध्यम से श्यामा प्रसाद ने सुहरावर्दी की योजना को उलट दिया और एक तरह से पाकिस्तान को विभाजित कर दिया। एक बार नेहरू पर किए उनके इस कटाक्ष की बहुत चर्चा हुई थी कि ‘आपने भारत का विभाजन कराया था, जबकि मैंने पाकिस्तान का।’ पश्चिम बंगाल के लोगों को ही नहीं, भारत भर के बंगालियों को इस बात पर निरंतर चिंतन करना चाहिए कि यदि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलपूर्वक और साहसपूर्वक पश्चिम बंगाल बनाने के अभियान को आगे बढ़ाते हुए सफलता न पाई होती तो उनके भविष्य का क्या हुआ होता।

डॉ. मुखर्जी का एक अन्य महान प्रयास था जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ एकीकरण। इस अभियान में वे जीवित नहीं बच सके थे। उन्होंने पहले ही स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि अगर इस राज्य को औरों से अलग रहने की अनुमति जारी रही, तो यह अलगाववाद के कुत्सित सिद्धांत को फैलाने वाले केंद्र के रूप में विकसित होगा और भारत के राष्ट्रीय हितों और अखंडता के प्रति शत्रुभाव रखने वाली ताकतों के खेल का मैदान बन जाएगा। श्यामा प्रसाद ने यह भविष्यवाणी भी की थी कि पाकिस्तान और अन्य ताकतों द्वारा विभाजन और चरमपंथ की आग को हवा देने के चलते देश के एक प्रमुख क्षेत्र का ढीलाढाला एकीकरण भविष्य में अलगाव की मांग को भी जन्म देगा। भारत की नियति में उनका दृढ़ विश्वास था और इसीलिए, उन्होंने भारत के एकीकरण के लिए व्यक्तिगत रूप से संघर्ष करने का निर्णय किया। इसी संघर्ष के क्रम में भारत सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और गिरफ्तारी के ही दौरान उनकी मृत्यु हुई हो गई थी। उनके बलिदान ने अलगाववाद, उग्रवाद और अंततः आतंकवाद की चुनौतियों को भारत के लोगों के सामने रखते हुए उन्हें इनके खतरों और इनके कारण भविष्य में आने वाले खतरों के बारे में आगाह कर दिया था। यह उनके बलिदान, अदम्य साहस, अपने दृष्टिकोण पर डटे रहने और भारत की संप्रभुता की रक्षा के मामले में किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार न होने के कारण ही संभव हुआ था कि जम्मू-कश्मीर का महत्वपूर्ण तथा सामरिक और सभ्य हिस्सा आज भी भारत में है। बलिदान की आग में अपनी आहुति देकर ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी सुनिश्चित कर सके थे कि भारत की एकता हमेशा अक्षत रहे। उनकी मृत्यु वीरोचित थी और वह शायद खुद ऐसा ही चाहते थे। एक बार उन्होंने अत्यंत मार्मिकता से लिखा था कि ‘मेरी उत्कट इच्छा है कि सचाई के लिए लड़ते हुए ही मेरा अंतिम समय आए।’ श्री गुरुजी गोलवलकर उन्हें ‘अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने वाले उस सच्चे सेनानी के रूप में देखते थे जिसकी मृत्यु ‘कश्मीर के एकीकरण की लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर हुई थी।’ वीर सावरकर उन्हें भारत का ‘अग्रणी राष्ट्रभक्त, राजनीतिज्ञ और एक जन्मजात सांसद’ मानते थे और उन्होंने भारतीय गणतंत्र में कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के लिए संघर्ष जारी रखने का आह्वान भी किया था। लेकिन प्रख्यात शिक्षाविद, सार्वजनिक व्यक्तित्व, विचारक, कुछ समय तक संविधान सभा के सदस्य और स्वराज पार्टी के नेता एमआर जयकर की श्रद्धांजलि शायद सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और झिंझोड़ने वाली थी। उन्होंने श्री मुखर्जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, ‘ अपने ही देश की स्वदेशी सरकार और सरकार में साथी रहे लोगों द्वारा कैद कर जेलखाने में रखा जाना और मृत्यु को प्राप्त करना एक लड़ाकू जीवन के लिए बिलकुल उपयुक्त समाप्ति हैं… उम्मीद की जानी चाहिए कि यह घटना भारत सरकार को उसके व्यवहार की अतियों तथा सभ्य सरकारों द्वारा स्वीकार की जाने वाले निष्पक्षता और न्याय के सभी मानकों की अनदेखी का अनुभव करवाएगी।’

आज, उनकी मृत्यु के 67 साल बाद डॉ. मुखर्जी की अंतिम लड़ाई जीती जा चुकी है। उनके अंतिम संघर्ष का फल तब मिला जब अगस्त 2019 में प्रधान मंत्री मोदी के दृढ़ निश्चय तथा गृहमंत्री अमित शाह द्वारा अत्यंत बुद्धिमत्ता एवं कुशलता से संचालित संसदीय रणनीति के परिणामस्वरूप अनुच्छेद 370 अंततः समाप्त कर दिया गया। मई 2020 में जम्मू और कश्मीर अधिवास अधिनियम के पारित होने से इस एकता को और मजबूती मिली है। यह डॉ. मुखर्जी की दृष्टि और इस क्षेत्र समेत पूरे भारत के लिए उनकी भावना के प्रति श्रद्धांजलि भी है। जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण और अंतिम एकीकरण के लिए डॉ. मुखर्जी का संघर्ष किसी राजनीतिक लाभ के संकीर्ण जोड़-घटाव पर आधारित नहीं था। उनका दृढ़ मत भारत के संविधान में उनके दृढ़ विश्वास तथा इस तथ्य पर आधारित था कि यह संविधान सभी भारतीयों के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक कहीं भी निवास करने वाले भारतीय को संविधान-प्रदत्त संभावनाओं का समान रूप से लाभ मिलना चाहिए। उनकी लड़ाई समता, न्याय और सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए समान अवसरों के लिए थी। घाटी में कुछ राजनीतिक दलों द्वारा दशकों तक चलाई गई पीड़ित होने और भय की जिस राजनीति के खिलाफ प्रजा परिषद का अंदोलन खड़ा हुआ था और जिसका नेतृत्व डॉ. मुखर्जी ने किया था अंततः अपनी अंतिम परिणति पा गया है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोग अब वास्तव में एक नई दृष्टि के साथ हुई ताजा शुरुआत के परिणाम पाने को उत्सुक हैं।

यद्यपि भारत की असंदिग्ध एकता के सत्य के पक्ष में संघर्ष ने डॉ. श्यामा प्रसाद को शारीरिक रूप से समाप्त कर दिया था, तथापि इसी लड़ाई ने अनंतकाल से चले आ रहे भारत की रक्षा और उसके पोषण के लिए प्रयासरत लोगों की स्मृति में उन्हें अमर बना दिया। 23 जून 1953 को भौतिक रूप से समाप्त हो जाने के 67 साल बाद भी डा. श्यामाप्रसाद हमें निस्वार्थ क्रियाशीलता के लिए प्रेरित करते हैं।

(लेखक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेंशन के निदेशक हैं)

Leave a Reply