एक अनुकरणीय केस स्टडी है मोदी का कोविड मॉडल


वैश्विक महामारी कोरोना से निपटने में भारत का मॉडल पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण बन गया। स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी संकट से निबटने में ‘टीम इंडिया’ के तौर पर यह पहला  राष्ट्रव्यापी अभियान  भी निरूपित किया जा सकता है। सितंबर में इस महामारी के चरम दौर (एक दिन में 97894 केस ) गुजरने के बाद आज हमारी रिकवरी रेट 95 प्रतिशत से अधिक है जो पूरे विश्व मे सर्वाधिक है। 14 दिसम्बर के दिन तक कुल चिन्हित 94,22,636 मरीजों में से केवल 3,39,820 एक्टिव केस का डाटा इस बात का संकेत है कि भारत ने सुनियोजित तरीके से इस खतरनाक महामारी पर  काबू पा लिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सशक्त औऱ दूरदर्शिता से परिपूर्ण नेतृत्व से यह सब संभव हो सका।

आज विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर सभी प्रमुख राष्ट्रों ने कोरोना संकट से निपटने के मामले में न केवल भारत के घरेलू मॉडल को सराहा है बल्कि वैश्विक योगदान को भी अधिमान्यता प्रदान की है। 12 नवम्बर को डब्ल्यूएचओ प्रमुख टैड्रोस ऐडरेनॉम ग़ैबरेयेसस ने प्रधानमंत्री मोदी को सार्वजनिक रूप से भारतीय योगदान के लिए धन्यवाद दिया।

तथ्य यह है कि भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे राष्ट्र में इस महामारी पर जिस प्रभावी और प्रमाणिक तरीके से काबू पाने का प्रयास किया गया है वह बहुआयामी महत्व की केस स्टडी भी है। जटिल प्रशासनिक ढांचे औऱ पारस्परिक रूप से गुंथी हुई लोक आर्थिकी के चलते लॉक डाउन जैसे अनुप्रयोग बहुत दीर्घजीवी नही हो सकते थे, इसके बावजूद अगर धरती की 17 फीसदी आबादी समेटे भारत आज पूरी दुनिया के लिए मॉडल बनकर खड़ा है तो इसके पीछे टीम इंडिया की भावना ही मुख्य कारक है।

इस भावना को प्रधानमंत्री मोदी ने हर मोर्चे पर कायम रखा है। न केवल प्रशासनिक  निर्णय बल्कि एक टीम लीडर के रूप में भी मोदी ने भारतीय जनमन को सीधे जोड़ कर रखा। एक तरफ जहां अमेरिकी राष्ट्रपति कोरोना का मजाक उड़ाते रहे, मास्क को लेकर उपहासपूर्ण टिप्पणियां करते रहे, इस बीच भारत के प्रधानमंत्री 6 बार राष्ट्र को संबोधित करने आये। हर बार उन्होंने नागरिकों से कोरोना गाइडलाइंस के अनुपालन औऱ सरकारी एडवाइजरी को मानने की अपील की। सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर प्रधानमंत्री ने खुद एक प्रभावी ब्रांड एंबेसडर के रूप में काम किया।

प्रधानमंत्री ने अपनी लोकस्वीकार्यता का प्रयोग एक स्टेट्समैन की तरह, इस महामारी से निपटने के लिए तथा व्यापक जनभागीदारी खड़ी करने  के लिए किया। खतरनाक स्तर का भय लेकर आई इस महामारी से निपटने में सलंग्न वारियर्स के मनोबल को ऊंचा रखने के लिए प्रधानमंत्री ने दीप प्रज्ज्वलन, घण्टी नाद, पुष्पवर्षा जैसे राष्ट्रीय आह्वान संस्थित किये ताकि पीड़ितों की सेवा और उपचार में लगे मानव संसाधन में ऊर्जा और उत्साह का संचार अनवरत रहे। इन आह्वानों का कतिपय विध्न संतोषियो ने माख़ौल भी उड़ाया लेकिन  इसका दूरगामी महत्व आज पूरी दुनिया मान रही है। जब ब्रिटेन,अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र फिर से लॉकडाउन के लिए मजबूर हो रहे है वहीं भारत में कोरोना की लहर कमजोर पड़ चुकी है। यह हमारे सतत प्रयासों का प्रतिफल है। आंकड़े भी इस समेकित सफलता को बयां करते हैं। हर दस लाख की आबादी पर भारत में मृतकों की संख्या 83 रही है तो अमेरिका में 665,ब्रिटेन में 644,ब्राजील में 725,स्पेन में 727।

अमेरिका में दुनिया की केवल 4 फीसदी आबादी रहती है लेकिन कोरोना से दुनिया में मरने वाली कुल संख्या का 20 फीसदी तो अकेले अमेरिकन है। भारत जहां दुनिया की 17 फीसदी आबादी है वहां यह आंकड़ा मात्र 10 फीसदी है। प्रति दस लाख में संक्रमित की संख्या भारत में 5500 रही वहीं अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों में यह 2500 थी।  इसके बाद मौतों का यह आंकड़ा हमारे प्रयासों की सामूहिक संकल्प शक्ति और  समावेशी नेतृत्व अपील को साबित करता है।

वह भी तब जबकि हमारी आबादी का घनत्व अमेरिका की 35 की तुलना में 400 से ज्यादा है। निःसन्देह हर नागरिक की कोरोना से होने वाली मौत हमारे लिए दुःखद है इसके बावजूद हमारे सम्मिलित प्रयासों ने इस महामारी की त्रासदी से हमें तुलनात्मक रूप से कैसे बचाया है? इसके लिए हमें पीएम की टीम इंडिया स्प्रिट औऱ त्वरित निर्णयन को रेखांकित करना ही होगा।

8 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री के निर्देश पर भारत में पहली विशेषज्ञ बैठक हुई जिसमें इस महामारी को लेकर विचार विमर्श हुआ। 17 जनवरी को सरकार ने चीन से आने वाले हवाई यात्रियों की स्क्रीनिंग के आदेश दे दिए। 25 जनवरी को सचिव स्तरीय बैठक में आगामी कार्ययोजना पर कार्य आरम्भ हो चुका था। 29 जनवरी को सरकार ने स्थिति को समझते हुए एन 95 औऱ पीपीई किट के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। यह सब करवाई 30 जनवरी को भारत में पहला कोरोना केस सामने आने से पूर्व की जा चुकी थी। 31 जनवरी को सरकार ने 6 क्वारन्टीन सेंटर्स स्थापित कर दिए। 3 फरवरी को सरकार ने मंत्री समूह बनाकर मामलों पर निगरानी का निर्णय लिया।

26 फरवरी तक चीन, सिंगापुर, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, साउथ कोरिया, ईरान, इटली से आने वाले  भारतीय नागरिकों को लेकर एडवाइजरी जारी हो चुकी थी। 3 मार्च को 06 कोरोना केस सामने आते ही सरकार ने सभी राष्ट्रों से आने वालों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई।

04 मार्च को पीएम ने ट्वीट कर देशवासियों से होली पर्व पर सोशल गेदरिंग नही करने का आह्वान किया औऱ 7 मार्च को उन्होंने स्थिति की खुद अधतन समीक्षा की। 14 मार्च तक देश में एक साथ 52 प्रयोगशालाए बनकर तैयार हो चुकी थी। 19 मार्च को प्रधानमंत्री ने मात्र 200 पॉजिटिव केस होने पर देश को संबोधित किया और जनता कर्फ्यू का आह्वान किया। 22 मार्च से देश मे सभी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों पर रोक लगा दी गई। 24 मार्च को पीएम ने 21 दिन का  लॉक डाउन  घोषित कर दिया। भारतीय लोकजीवन की कमजोर आर्थिक कड़ियों के मद्देनजर सरकार ने गरीब कल्याण पैकेज की घोषणा कर करीब 67 करोड़ नागरिकों को एक वैकल्पिक आर्थिक सुरक्षा कवच देनें का काम भी किया।

दूसरी तरफ ढांचागत स्वास्थ्य सुविधाओं को जुटाने में पूरा पराक्रम झोंका गया। जिस समय कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित किया गया भारत में टेस्टिंग की चुनिंदा सरकारी लैब स्थित थी लेकिन इनकी संख्या बढाकर 6 मार्च को 31 कर दी गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दस लाख की आबादी पर 140 टेस्ट की सिफारिश की थी लेकिन भारत मे चरणबद्ध तरीके से टेस्टिंग को बढ़ाया गया। दस लाख पर हमारे यहां 828 कोरोना सैंपल लिए गए जो वैश्विक मानक से छह गुना अधिक है।

भारत ने कोरोना की इस असमय चुनौती का जिस सुनियोजित औऱ त्वरित गति से मुकाबला किया है वह अपने आप में एक केस स्टडी इसलिए भी है क्योंकि शुरुआती चरण में विशेषज्ञ यही दावा कर रहे थे कि कोरोना से लड़ने में भारत का बुनियादी स्वास्थ्य ढांचा बिल्कुल भी सक्षम नही है। एन 95 मास्क औऱ पीपीई किट के लिए दूसरे देशों पर निर्भर भारत के प्रति ये आशंकाए निर्मूल भी नही थी लेकिन नए भारत में बदली हुई शासन की सँस्कृति समस्याओं के टालने नही उनका सामना करने में भरोसा करती है।

नतीजतन हर दिन भारत ने तीन लाख पीपीई किट्स औऱ 4 लाख से अधिक एन 95 फाइव मास्क का निर्माण कर चीन के एकाधिकार खत्म किया। वेंटीलेटरो की उपलब्धता  को लेकर व्यक्त की गई आशंकाए भी गलत साबित हुई क्योंकि रिकार्ड समय में हमनें स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों की सहायता से दस लाख आइसोलेशन बेड  विभिन्न स्तर पर खड़े कर लिए।प्रधानमंत्री ने लॉक डाउन के साथ ही रोजाना 17 से 18 घण्टे प्रतिदिन काम किया।

11 विषय विशेषज्ञों की कोर टीम के साथ उनकी प्राय प्रतिदिन बैठकें होती थी। इस जंग में सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भी प्रधानमंत्री ने कोई कोर कसर नही छोड़ी उन्होंने वीडियो कांफ्रेंसिंग एवं अन्य ई प्लेटफॉर्म के जरिये समाज के सभी वर्गों से सीधा संवाद स्थापित कर आम जनजीवन में एक आत्मविश्वास बनाए रखा। प्रधानमंत्री की यह भूमिका किसी चिंतित अभिभावक की तरह रेखांकित की जा सकती है। उनकी अपील पर न केवल भारतीय जनता पार्टी का पूरा संगठन बल्कि भारत की सक्षम सज्जन शक्ति भी अपने जरूरतमंद भाई बहनों की यथासंभव मदद के लिए उठ खड़ी हुई।

पूरी दुनिया ने भारतीयों के इस चरित्र को देखा। पीएम केयर्स फंड में एकत्रित हुआ धन भी इस संकट से निपटने का बेहतरीन उपकरण साबित हुआ। यह फंड भारतीय जनमानस में पीएम की विश्वसनीयता को भी प्रमाणित करने वाला साबित हुआ। कोरोना संकट ने प्रधानमंत्री की शख्सियत को एक सशक्त औऱ दृढ़ इच्छाशक्ति वाले ग्लोबल लीडर के रूप में भी स्थापित किया है। इस संकटकाल में जहां भारत ने अपनी आत्मनिर्भरता की संभावनाओं को मजबूती से पहचाना है वहीं अपने स्वास्थ्य ढांचे को भी एक नया आधार दिया है। आने वाले समय में हमारी एकीकृत स्वास्थ्य नीति जनआरोग्य औऱ कोरोना जैसी महामारियों के मामले में एक वैश्विक मिसाल बन सकती है। इस संकट में भारत ने अपने विश्व बंधुत्व के मूल दर्शन को भी प्रमाणित करके दिखाया है।

दुनिया के 150 देशों को भारत ने इस दौरान चिकित्सा उपकरणों, दवाओं, पीपीई किट्स और मास्क की उपलब्धता सुनिश्चित कर यह संदेश दिया कि विश्व व्यवस्था में अब उसकी अनदेखी संभव नही है। कोविड संकट में हमारी वैश्विक हैसियत को केवल गरीब बल्कि धनीमानी राष्ट्रों ने भी स्वीकार किया है। चीनी वायरस से कराहती मानवता के लिए भारत ने सेवा, परोपकार औऱ सहअस्तित्व के अपने बुनियादी आचरण से एक नई मिसाल पेश की।

ब्राजील की धरती पर जब हमारे कार्गो विमान दवा औऱ अन्य चिकित्सकीय सामग्री लेकर उतरे तो वहां के पीएम ने  इसे “हनुमान की संजीवनी” का नाम दिया। अमेरिका जैसे ताकतवर औऱ सम्पन्न राष्ट्र को भी हमने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा उपलब्ध कराई।

स्पष्ट है कि भारत ने कोरोना की इस आपदा को एक अवसर में परिवर्तित कर पूरी दुनियां को एक राह दिखाई है। न केवल कोरोना से निपटने बल्कि इसके वैक्सीन निर्माण में आज भारत पूरी मानवता के लिए एक आशा केन्द्र के रूप में खड़ा है। यह प्रधानमंत्री के आह्वान औऱ भरोसे का ही नतीजा है। यह नए भारत के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि ही है कि 190 देशों ने भारत मे निर्मित होने वाली वैक्सीन में रुचि दिखाई है। हकीकत यह है कि कोई राष्ट्र वैक्सीन बनाएं लेकिन उसे पूरी दुनियां में पहुंचाने के लिए भारत की निर्माण कम्पनियों की सहायता ही लेनी होगी क्योंकि भारत ही इस समय सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता राष्ट्र है।

सच्चाई यह है कि भारत ने इस मामले में चीन को पीछे कर दिया है और आज विश्व व्यवस्था में कोरोना डिप्लोमेसी का अहम हिस्सा बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे लगता है समय रहते ही पकड़ लिया था। इसीलिए घनघोर कोरोना लहर में भारत ने 150 देशों को कोरोना मदद सुनिश्चित की। नतीजतन सीरम इंस्टीट्यूट की तरफ आज अमेरिका से लेकर अफ्रीका के सभी गरीब राष्ट्रों की भी नजर टिकी हुई है जहां कोविशील्ड वेक्सीन लगभग तैयार है।

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि भारत के अंतिम छोर के नागरिक को भी वैक्सीन कवर उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही अफ्रीकन राष्ट्रों के लिए हम सबसे सस्ते वेक्सीन देनें के संकल्प को भी पूरा करने की स्थिति में है। सच्चे अर्थों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय का मंत्र ही मोदी सरकार की अभिप्रेरणा है जो अंतत अंतिम छोर के मानव कल्याण की बात करता है। नए भारत का यह वैशिष्ट्य वाकई हमें गौरवभाव से भर रहा है।

(लेखक लोकनीति विश्लेषक हैं, लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

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