Round Table Discussion on "Prime Minister's visit to Indonesia: an Overview" by Prof. Baladas Ghoshal (Secretary General, Society for Indian Ocean Studies) on 12 July 2018 at 5.30 PM, SPMRF Conference Room, 9, Ashoka Road, New Delhi

विकासवाद की जीत

भूपेन्द्र यादव

गुजरात के विधानसभा चुनाव 2017 का परिणाम बहुत महत्वपूर्ण है। ये चुनाव भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। गौर करें तो परम्परागत भारतीय राजनीति में चुनाव जाति, वंश, संप्रदाय आदि बिन्दुओं पर प्रमुख रूप से केन्द्रित रहता आया है। काफी सारे चुनाव विश्लेषक इन बिन्दुओं को लेकर चुनावों से सम्बंधित भविष्यवाणी भी करते रहे हैं। परन्तु, गुजरात का चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में वंशवाद और जातिवाद के खिलाफ विकासवाद के नारे के साथ लड़ा।

गुजरात चुनाव जब प्रारंभ हुआ तब कांग्रेस ने न केवल भाजपा की विकास की राजनीति का विरोध किया, बल्कि भ्रामक प्रचार के माध्यम से यह धारणा स्थापित करने का प्रयास भी किया कि गुजरात के विकास में सत्यता नहीं है। हालांकि अपने इस प्रयास में कांग्रेस बिलकुल भी सफल नहीं हो सकी। भारतीय जनता पार्टी लगातार विकास के मुद्दे के साथ इस चुनाव में आगे बढ़ती रही। चुनाव के दौरान ही विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से भी गुजरात के विकास दर के दस प्रतिशत होने की बात सामने आई। अगर गुजरात में विगत 22 वर्षों के भाजपा शासन को देखें तो कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में गुजरात ने बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से विकास किया है। सरकार की नीतियों के परिणामस्वरूप रोजगार के अवसर भी पैदा हुए।

इधर, केंद्र सरकार ने विमुद्रीकरण और जीएसटी के रूप में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। कांग्रेस को लगा था कि वह विमुद्रीकरण और जीएसटी के मुद्दों के द्वारा गुजरात चुनाव में जीत हासिल कर लेगी, मगर जनता ने उसकी इस मंशा को सिरे से खारिज कर दिया। अगर इस चुनाव का समग्र विश्लेषण करें तो इस चुनाव में विकास के मुद्दे और सरकार के प्रति जनता का विश्वास स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि गुजरात में विकास की जो प्रक्रिया चली है, उसका लाभ गुजरात के सभी लोगों को मिला है। यहाँ तक कि कांग्रेस के समय जब रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट आई थी, तो उसमें भी बताया गया था कि गुजरात में अल्पसंख्यकों का विकास अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर ढंग से हुआ है।

वैसे, विकास का तात्पर्य सिर्फ सरकार की नीतियों से नहीं है, इसके अंतर्गत कई और विषय भी आते हैं। क़ानून व्यवस्था की स्थिति, महिलाओं के सम्मान की स्थिति, अधिकतम कल्याणकारी नीतियों को जनता तक पारदर्शी ढंग से पहुंचाने की व्यवस्था, भ्रष्टाचार का अंत, निर्णायक नेतृत्व – ये सब भी विकास के मानक होते हैं, जिनमें गुजरात की स्थिति बहुत बेहतर है।

विकास के अलावा गुजरात चुनाव का जो दूसरा केंद्र बिंदु रहा है, वो है सुशासन। लेकिन, इस चुनाव समेत पहले भी कांग्रेस जब चुनाव लड़ी है, उसने वोट बैंक की राजनीति को ही प्रमुख माना है। दलित से लेकर अल्पसंख्यक तक सभीको वोट बैंक के रूप में देखने की राजनीति करती आई है। कांग्रेस शासन के दौरान ‘खाम’ की राजनीति गुजरात ने देखा है। ‘खाम’ की राजनीति का अर्थ है कि वर्ग-विशेष के लोगों को लामबंद कर वोटबैंक बनाकर के चुनाव को जीता जाए। इसबार भी कांग्रेस ने पाटीदार समाज के अंदर असंतोष फैलाकर हार्दिक पटेल के माध्यम से आन्दोलन चलाने की कोशिश की, वहीं अपनी ही पार्टी के एक हारे हुए एक जिला पंचायत सदस्य को ‘ठाकुर सेना’ नामक संगठन के रूप में खड़ा किया। जिग्नेश मेवाणी को ‘दलित सेना’ के नाम से खड़ा किया। अन्य समाजों में भी छोटे-छोटे विषयों पर झगड़े खड़े किए। परन्तु, पूरे चुनाव को देखने पर यह साफ़ होता है कि राहुल गाँधी ने सीधे किसीसे बात नहीं की, क्योंकि कांग्रेस जानती थी कि उनके षड्यंत्र को जनता समझ चुकी है। कांग्रेस सिर्फ भाजपा के प्रति एक भ्रम की स्थिति गुजरात के विभिन्न समाजों में फैलाना चाहती थी, इसके पीछे कांग्रेस का मूल उद्देश्य यह था कि गुजरात आपस में बंट जाए और इसका राजनीतिक लाभ उसे मिले। परन्तु, ऐसा नहीं हो पाया। कांग्रेस के जातिवाद के स्थान पर गुजरात के लोगों ने मोदी जी के नेतृत्व में जो सुशासन और विकास की राजनीति हो रही है, उसको अधिक महत्व दिया है।

ये चुनाव ‘डेमोक्रेसी’ और ‘डायनेस्टी’ के बीच में भी था। इस चुनाव के दौरान ही ‘डायनेस्टी पॉलिटिक्स’ की परम्परा को जारी रखते हुए श्री राहुल गाँधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं। वहीं लोकतान्त्रिक तरीके से चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अपनी संगठनात्मक शक्ति को बढ़ाया। इस चुनाव के आरम्भ होने से पूर्व भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासी क्षेत्रों में दलित-यात्रा की। भारतीय जनता पार्टी ने दीन दयाल जन्म शताब्दी वर्ष की योजना के अंतर्गत एक विस्तारकों की योजना का निर्माण किया, जिसके द्वारा सभी बूथों तक विस्तारक गए। भारतीय जनता पार्टी ने मजबूत सांगठनिक ढाँचे के माध्यम से शक्ति-केन्द्र की स्थापना की जिसके माध्यम से प्रत्येक राजनीतिक गतिविधि की निगरानी के साथ-साथ कार्यों में तेजी के लिए दबाव बनाए रखने का कार्य सीधे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जी ने किया। अपने विषयों और विचारों सहित बाईस वर्षों का हिसाब राज्य की जनता तक पहुँचाने के लिए पार्टी ने घर-घर लोक संपर्क अभियान भी चलाया।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की 33 जनसभाओं, राष्ट्रीय अध्यक्ष की जनसभाओं और केन्द्रीय नेताओं की जनसभाओं को मिलाकर भारतीय जनता पार्टी ने 400 के आसपास जनसभाएं की। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जीतुभाई वगानी और पार्टी के उपमुख्यमंत्री नितिन भाई पटेल के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात की दो यात्राएं भी कीं। भाजपा ने ये पूरा चुनाव अपने कैडर के दम पर लड़ा और इसमें कई प्रयोग भी किए।

एक तरफ जब कांग्रेस बैलगाड़ी की बात कर रही थी, तो वहीं भारतीय जनता पार्टी सी-प्लेन को प्रदेश की जनता के समक्ष विकास के एक मॉडल के रूप में लेकर आई। कांग्रेस ने इस चुनाव में ‘ध्रुवीकरण’ की राजनीति का प्रयास किया, जिसके लिए उसकी तरफ से मंदिर, जनेऊ जैसे बयान दिए गए। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने इन बिन्दुओं को नकारते हुए विकास की बात की।

विचार करें तो ये चुनाव ‘मॉडर्निटी’ बनाम ‘मिडायवल युग’ के बारे में भी था। यहाँ मॉडर्निटी का अर्थ है कि हम वो सारे निर्णय लें जो देशहित में हों। हम उन नीतियों को लागू करें तथा उन तकनीकों का विकास करें जिससे देश आगे बढ़ सके। ‘मिडायवल युग’ का अर्थ है कि लोगों को जाति और कबीलों में बाँटकर देखा जाए। यही कारण है कि राहुल गाँधी से लेकर हार्दिक और जिग्नेश की सभा कभी भी किसी विश्वविद्यालय के कैम्पस में छात्रों के बीच नहीं हुई। कुछ लोगों का हुजूम इकठ्ठा करके उन लोगों ने यह भय पैदा करने की कोशिश की कि गुजरात में आन्दोलन खड़ा हुआ है, जबकि वास्तविकता ये नहीं थी। दूसरी तरफ, विभिन्न वर्गों और समूहों से बात करने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का टाउन हॉल का कार्यक्रम हुआ; महिलाओं से संवाद के लिए सुषमा स्वराज का कार्यक्रम हुआ; दलित, ओबीसी, आदिवासी समाजों से सीधा संपर्क किया गया; प्रधानमंत्री जी के सीधे तौर पर सभी लोगों के साथ ऑडियो संवाद हुए। इस प्रकार स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि वैचारिक रूप से ये चुनाव ‘मॉडर्निटी’ बनाम ‘मिडायवल युग’ के बीच का था।

इसके अलावा इस चुनाव का दूसरा बड़ा सन्देश ये है कि कांग्रेस की ‘यूज एंड थ्रो’ की जो राजनीति है, लोग उसको अच्छे से समझ गए हैं। दलित, ओबीसी से लेकर अल्पसंख्यक समुदाय तक के लोग यह बात भलीभांति समझ गए हैं कि कांग्रेस की राजनीति केवल उनके वोट के लिए है। ये सब कारण हैं कि इस गुजरात चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई है।

देश के लोकतंत्र में सुधारों का जो क्रम है, वो लम्बे समय तक चलने वाला है। हमारे देश में सुशासन की राजनीति को लम्बे समय तक जारी रखने की आवश्यकता है। सुशासन की राजनीति के संदर्भ में प्रधानमंत्री का सी-प्लेन कार्यक्रम सबसे ताजा उदाहरण है। अहमदाबाद के रिवर फ्रंट से दूर-देहात में स्थित ढेरों बांधों को जोड़ने का जो काम हुआ है, वो दर्शाता है कि तकनीक अगर अहमदाबाद के शहरी क्षेत्रों के लिए है, तो ग्रामीण क्षेत्र के बांधों के लिए भी है।

गुजरात ने हाल के वर्षों में कृषि से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, उस दृष्टि से आवश्यक तकनीक, शासन में जनता की भागेदारी और कुल मिलाकर समृद्धि सभी लोगों के पास हो। भारत जिन जीवन-मूल्यों को लेकर आगे बढ़ता रहा है, उनमें परिवार, संस्कृति, सौहार्द, विकास और तकनीक के नवीन प्रयोग द्वारा एक नए भारत के निर्माण का संकल्प है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को इस नए भारत के संकल्प की पूर्ति के लिए ये जनादेश प्राप्त हुआ है, जिसकी प्राप्ति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व और भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह के सांगठनिक अनुशासन की प्रमुख भूमिका रही है।

(लेखक राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं)

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