Release of "नए भारत की ओर" by Shri Ravi Shankar Prasad (Union Minister of Law & Justice and Electronics and Information Technology, Govt. of India) on Monday, 25th March 2019, 6.00 PM, Speaker Hall, Constitution Club of India, Rafi Marg, New Delhi.

Salient points of PM’s address at the Indian community event in Kobe, Japan

अंतरराष्‍ट्रीय संबंधों में पूर्ण बहुमत वाली सरकार होना बहुत बड़ी बात होती है, लेकिन पूर्ण बहुमत वाली सरकार में भी पहले से अधिक जनमत जब जुड़ता है तो वो शक्ति तो बढ़ती है, लेकिन उससे ज्‍यादा विश्‍वास बढ़ता है।

सबका साथ-सबका विकास, और उसमें लोगों ने अमृत मिलाया, सबका विश्‍वास। इसी मंत्र पर हम चल रहे हैं- वो भारत पर दुनिया के विश्‍वास को भी और मजबूत करेगा और विश्‍व को आश्‍वस्‍त करेगा- यही मैं अनुभव कर रहा हूँ, ये विश्‍व को आश्‍वस्‍त करेगा।

साथियो, जब दुनिया के साथ भारत के रिश्‍तों की बात आती है तो जापान का उसमें एक अहम स्‍थान है। ये रिश्‍ते आज के नहीं हैं बल्कि सदियों के हैं। इनके मूल में आत्‍मीयता है, सद्भावना है, एक-दूसरे की संस्‍कृति और सभ्‍यता के लिए सम्‍मान है। इन रिश्‍तों की एक कड़ी महात्‍मा गांधी जी से भी जुड़ती है। संयोग से ये पूज्‍य बापू की 150वीं जन्‍म जयंती का भी वर्ष है। गांधी जी की एक सीख बचपन से हम लोग सुनते आए हैं, समझते आए हैं, और वो सीख थी- बुरा मत देखा, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो। भारत का बच्‍चा-बच्‍चा इसे भलीभांति जानता है। लेकिन बहुत कम लोगों को ये पता है कि जिन तीन बंदरों को इस संदश के लिए बापू ने चुना- उनका जन्‍मदाता 17वीं सदी का जापान है। मिजारू, किकाजारू और इवाजारू- जापान की धरोहर हैं, जिनको पूज्‍य बापू ने एक महान सामाजिक संदेश के लिए प्रतीकात्‍मक के रूप में चुना और उसको प्रचारित किया, प्रसारित किया।

सा‍थियो, हमारे आचार, व्‍यवहार और संस्‍कार की ये कड़ी जापान में बौद्ध धर्म के आने से भी पहले की बताई जाती है। अभी अगले महीने क्‍योटो में गियोन त्‍योहार आने वाला है। और इस गियोन त्‍योहार में जिस रथ का उपयोग होता है, उसकी सजावट भारतीय रेशम के धागों से होती है। और ये परम्‍परा आज की नहीं है, अनगिनत काल से चली आ रही है।

इसी तरह शिचिफुकुजिन- Seven Gods of Fortune, उन Seven Gods में से चार का संबंध सीधा-सीधा भारत से है। माँ सरस्‍वती के बेंजाइटिन, माँ लक्ष्‍मी की किचिजोटेन, भगवान कुबेर की विशामोन, और महाकाल की दाइकोकुतेन के रूप में जापान में मान्‍यता है।

साथियो, Fabric printing के जुशोबोरी आर्ट भारत और जापान के रिश्‍तों का एक बहुत पुराना एक प्रकार से ताना-बाना है, सूत्र है। गुजरात के कच्‍छ और जामनगर में सदियों से बाँधनी जिसको कहते हैं, बंधानी कोई बोलते हैं कोई बंदानी बोलता है, उसके कलाकार इस कला में उसी resist technique का उपयोग करते हैं जो यहाँ भी सदियों से इस्‍तेमाल होती है। या‍नी जापान में उस काम को करने वाले लोग और कच्‍छ में जामनगर में करने वाले आपको ऐसे ही लगेगा आप जापान में हैं और जापान वाले वहाँ जाएंगे तो लगेगा गुजरात में हैं, इतनी similarity है। इतना ही नहीं- हमारे बोलचाल के भी कुछ सूत्र हैं जो हमें जोड़ते हैं। जिसे भारत में ध्‍यान कहा जाता है उसे जापान में Zenकहा जाता है और जिसे भारत में सेवा कहा जाता है उसे जापान में भी सेवा ही कहा जाता है। सेवा परमो धर्म:, यानी नि:स्‍वार्थ सवा को भारतीय दर्शन में सबसे बड़ा धर्म माना गया है, वहीं जापान के समाज ने इसको जी करके दिखाया है।

साथियो, स्‍वामी विवेकानंद, गुरुदेव रवीन्‍द्रनाथ टैगोर, महात्‍मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, जस्टिस राधा विनोदपाल सहित अनेक भारतीयों ने जापान के साथ हमारे रिश्‍तों को मजबूत किया है। जापान में भी भारत और भारतीयों के लिए प्‍यार और सम्‍मान का भाव रहा है।

इसी का परिणाम था कि दूसरे विश्‍वयुद्ध की समाप्ति के बाद से ही भारत-जापान के बीच के रिश्‍ते और मजबूत होने लगे हैं। लगभग दो दशक पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और प्रधानमंत्री योशिरो मोरी जी मिलकर हमारे रिश्‍तों को global partnership का रूप दिया था।

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे मेरे मित्र प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ मिलकर इस दोस्‍ती को मजबूत करने का मौका मिला। हम अपने diplomatic relationship को राजधानियों और राजनायिकों की औपचारिकताओं के दायरे से बाहर निकालकर सीधे जनता के बीच ले गए। प्रधानमंत्री आबे के साथ मैंने टोक्‍यो के अलावा क्‍योटो, ओसाका, कोबे, यमानासी, इसकी यात्राएँ भी कीं। यहाँ कोबे तो मैं, कभी-कभी गलती हो जाती है, कभी कहता हूँ चार बार, कभी कहता हूँ पाँच बार, कभी कहता हूँ तीन बार, यानी बार-बार आया हूँ। और पीएम नहीं था, तब भी आता था, आपके साथ बैठता था। प्रधानमंत्री आबे जी ने पिछले वर्ष यामानासी में अपने घर में उन्‍होंने मेरा स्‍वागत किया। उनका ये  स्‍पेशल gesture हर हिन्‍दुस्‍तानी के दिल को छूने वाली बात थी, वरना diplomatic relation में इस प्रकार का personal touch बहुत कम होता है।

दिल्‍ली के अलावा अहमदाबाद और वाराणसी प्रधानमंत्री आबे जी को मेरे मित्र को ले जाने का सौभाग्‍य मुझे मिला। प्रधानमंत्री आबे मेरे संसदीय क्षेत्र और दुनिया की सबसे पुरानी संस्‍कृति और आध्‍यात्मिक नगरी में से एक- काशी में गंगा आरती में भी शामिल हुए। और सिर्फ शामिल हुए नहीं, उनको जब भी जहाँ पर कुछ बोलने का मौका आया, उस आरती के समय उन्‍होंने जो अध्‍यात्‍म की अनुभूति की, उसका जिक्र किए बिना वो रहे नहीं, आज भी उसका उल्‍लेख करते हैं। उनकी ये तस्‍वीरें भी हर भारतीय के मन में बस गई हैं।

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