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पं. दीनदयाल उपाध्याय: एक कुशल संगठन वाहक

शिवानन्द द्विवेदी

25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा में जन्म लेने वाले पंडित दीन दयाल का स्पष्ट मानना था कि समाजवाद, साम्यवाद और पूँजीवाद व्यक्ति के एकांगी विकास की बात करते हैं जबकि व्यक्ति की समग्र जरूरतों का मूल्यांकन किये बिना कोई भी विचार भारत के विकास के अनुकूल नहीं होगा। पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने भारतीयता के अनुकूल पूर्ण भारतीय चिन्तन के रूप में “एकात्म मानववाद” का दर्शन प्रस्तुत किया जो आज भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा का आदर्श है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जीवन यात्रा के विविध आयाम हैं। कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कहने वाले पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार अर्थात पंडित नेहरु की नीतियों का न सिर्फ विरोध किया बल्कि उस विरोध के साथ-साथ वैकल्पिक वैचारिक मॉडल भी प्रस्तुत किया। उनके जीवन के अनेक पक्ष, अनेक आयाम और अनेक कार्य हैं जिनपर बहुत चर्चा नहीं हो पाई है।

संघ प्रचारक से जनसंघ अध्यक्ष तक

उत्तर प्रदेश में अभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य आरम्भ के दौर में ही था जब पंडित दीन दयाल उपाध्याय 1937 में संघ के स्वयंसेवक बने। वे उत्तर प्रदेश से बने प्रथम स्वयंसेवकों में से एक रहे होंगे। संघ का कार्य करते हुए उन्होंने पढ़ाई पूरी की लेकिन नौकरी नहीं करने का निश्चय करते हुए अपने जीवन को संघ कार्य हेतु समर्पित करने का निश्चय किया। इसी क्रम में 1942 से उनकी प्रचारक के रूप में दायित्वों की शुरुआत हुई। तबसे लेकर 1951 तक वे संघ के सह-प्रांत प्रचारक के दायित्व पर कार्य किये। यही वो दौर था जब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु केबिनेट से इस्तीफ़ा देने के बाद संघ के सर संघचालक गुरूजी से मिलकर एक वैकल्पिक राजनीतिक सन्गठन बनाने का प्रस्ताव रखा था। गुरु जी ने राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ को राजनीतिक सन्गठन बनाने का प्रस्ताव तो खारिज कर दिया लेकिन उन्होंने अपने प्रचारक पंडित दीन दयाल को भारतीय जनसंघ के कार्य हेतु अर्पित कर दिया। यहीं से दीन दयाल उपाध्याय के राजनीतिक सन्गठन में जीवन की शुरुआत होती है। वे जनसंघ के उत्तर प्रदेश सन्गठन मंत्री फिर संगठन महामंत्री बने। अपनी हत्या से कुछ दिनों पूर्व ही कालीकट अधिवेशन में वे जनसंघ के अध्यक्ष बने थे।

कुशल संगठक, सफल नेतृत्वकर्ता

वर्ष 1953 में जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्मय मृत्यु के पश्चात सन्गठन का समस्त दायित्व दीन दयाल उपाध्याय के कन्धों पर आ गया। वे कुशल संगठक थे। लोकसंग्रह करने के कौशल के धनी थे। सौम्यता, साधारण जीवन और कार्यकर्ताओं से जुड़ जाने का कौशल उन्हें संघ कार्य से ही मिला हुआ था। उन्होंने संगठन विस्तार पर कार्य शुरू किया। जब पंडित दीन दयाल जनसंघ के सन्गठन महामंत्री बने थे तब जनसंघ की लोकसभा में महज 2 सीटें होती थी एवं कम्युनिस्ट एवं स्वतंत्र पार्टी जैसे दल कांग्रेस के सामने दूसरे-तीसरे पायदान पर होते थे। लेकिन बिना शोर किये पंडित दीन दयाल ने संगठन कार्य को जमीनी स्तर पर इस तरह से किया कि वर्ष 1967 के चुनाव में भारतीय जनसंघ कांग्रेस समक्ष प्रमुख विपक्षी दल के रूप में दूसरे पायदान तक पहुँच गया था। यह देश के लिए वह आश्चर्य अनुभूति थी जिसे दीन दयाल उपाध्याय ने कर दिखाया था। शायद दीन दयाल के इस गुण-कौशल की अनुभूति करते हुए 1953 में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था, यदि मेरे पास और दो दीन दयाल हों तो मै भारत का राजनीतिक रूप बदल दूंगा।

नेहरु की नीतियों के प्रबल विरोधी

राज्य व्यवस्था द्वारा शासन द्वारा नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ती का दावा किसी न किसी विचारधारा के माध्यम से ही किया जाता है। भारतीय लोकतंत्र में भी दलीय उभार के मूल में विचारधाराएं ही रही हैं। स्वतंत्रता के पश्चात समाजवाद, मार्क्सवाद, पूँजीवाद जैसे मॉडल देश के सामने थे। प्रधानमंत्री नेहरु को देश के आमजनमानस का विश्वास हासिल था। सवाल सिर्फ इतना था कि नेहरु भारत के नागरिकों की आवश्यकताओं के लिए कौन सा वैचारिक मॉडल शासन की नीतियों  में लागू करते हैं! नेहरु की नीतियों को देखने से साफ़ पता चलता है कि वे किसी भारतीय विकासवादी मॉडल की बजाय आयातित समाजवाद और साम्यवाद के आकर्षण के पुर्वग्रह से कुछ ज्यादा ही ग्रसित थे। क्योंकि, उनके शासन का वैचारिक मॉडल समाजवाद के करीब जाता नजर आता है। ऐसा नहीं है कि तब नेहरु की नीतियों का विरोध नहीं हुआ था। उस दौरान भी अनेक दलों और अनेक विद्वानों ने उनकी नीतियों का विरोध किया। लेकिन नेहरु की नीतियों का तर्कसंगत विरोध करते हुए भारतीयता के अनुकूल विकासोंमुख “भारतीय मॉडल” रखने का कार्य जनसंघ के अग्रणी नेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय कर रहे थे।

एकात्म मानववाद के प्रणेता और अन्त्योदय की अवधारणा

पंडित दीन दयाल उपाध्याय का दृष्टिकोण सिर्फ विरोध का नहीं बल्कि रचानात्मक भी था। जिस बिंदु पर उनका विरोध होता था, उस बिंदु पर उनके पास विकल्प की दृष्टि भी होती थी। उन्होंने समाजवाद, मार्क्सवाद और पूँजीवाद को भारतीय दृष्टिकोण के प्रतिकूल मानते हुए अस्वीकार किया तो भारतीय दृष्टिकोण के अनुकूल “एकात्म मानववाद” का वैचारिक दर्शन भी प्रस्तुत किया। उनकी दृष्टि थी कि मनुष्य को सिर्फ एकांगी होकर “आर्थिक प्राणी” के रूप में देखने से विकास उन लक्ष्यों को नहीं प्राप्त किया जा सकता जिससे राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाया जाए। मनुष्य को इकाई मानकर उसकी समग्र जरूरतों, जैसे-सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, का समग्रता में चिन्तन करते हुए हमे विकास की प्रक्रिया को चलाना होगा।

सादगी, शुचिता और सरलता के मिसाल

भारतीय राजनीति में सादगी के कुछ उदाहरणों में से एक पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे। बेहद साधारण जीवन जीने वाले नेता थे। पॉलिटिकल डायरी में लिखा है, दीन दयाल एक महान नेता बन गए थे, परन्तु अपने कपड़े स्वयं साफ़ करते थे। वे स्वदेशी के बारे में शोर तो नहीं करते थे लेकिन कभी विदेशी वस्तु नहीं खरीदते थेपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके साथ कार्य करने का अवसर मिला है। अटल बिहारी वाजपेयी ने दीन दयाल उपाध्याय के बारे में कहा है, वे स्वयं संसद सदस्य नहीं थे, परन्तु वे जनसंघ के सभी संसद सदस्यों के निर्माता थे।मैशब्द के प्रयोग को वे निषिद्ध मानते थे।राजनीति में पंडित दीन दयाल उपाध्याय के लिए शुचिता प्राथमिक थी। उनके बारे में कहा जाता है कि वे कार्यकर्ताओं के आग्रह एवं तत्कालीन प्रांत प्रचारक भाऊ राव देवरस के कहने पर जौनपुर से चुनाव लड़े। यह वह चुनाव था जिसमे कांग्रेस ने जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसे हथकंडों का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। कांग्रेस ने राजपूतवाद का माहौल तैयार किया तो कुछ जनसंघ कार्यकर्ताओं ने दीन दयाल जी का नाम लेकर “ब्राह्मण” कार्ड चलने की योजना तैयार की। जब यह बात पंडित जी को पता चली तो वे बुरी तरह बिगड़ गये और फटकार लगाई। वे चुनाव नहीं जीत सके लेकिन अपनी राजनीतिक शुचिता को कभी हारने नहीं दिया। जौनपुर के लोग उस हार को आज भी एक आदर्श हार की जीत के रूप में याद करते हैं।

अपने जीवन में संगठन एवं राजनीति के तमाम आदर्शों को स्थापित करने वाले पंडित दीन दयाल उपाध्याय कुशल संपादक और लेखक भी थे। 11 फरवरी 1968 को उनकी रहस्यमयी हत्या ने असमय उनको हमसे छीन लिया, लेकिन वे जबतक रहे अपने मानदंडों पर जीने वाले सबके प्रिय रहे। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके संपूर्णानंद ने न सिर्फ उनके लेखों के संकलन “पॉलिटिकल डायरी” का प्राक्कथन लिखा है बल्कि उन्हें महान और भविष्य की राजनीति के लिए प्रेरणादायी नेता बताया है।

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं।)

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