Talk on "Political Landscape & Milestones of 2017" by Shri Bhupender Yadav, Member of Parliament (Rajya sabha) & National General Secretary, BJP on 17th January 2018, Wednesday at Conference Room-II (2nd floor), Main Building, IIC

आर्थिक तरक्की का रास्ता खोजने में लगी मोदी सरकार

हर्षवर्धन त्रिपाठी

मई 2014 में नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने, तो उनका एक सबसे बड़ा वादा उसकी तगड़ी बुनियाद माना जा सकता है। वो बुनियाद थी, युवाओं को रोजगार देने का वादा। लेकिन, दुनिया भर में गिरते रोजगार के बीच भारत जैसे नौजवान आबादी वाले देश में रोजगार देने का वादा पूरा करना मुश्किल था। नरेंद्र मोदी की सरकार मई 2014 में आई, उस पूरे साल में कुल 4.93 लाख रोजगार के मौके बने। लेकिन नौकरियों में गिरावट कोई 2014 के बाद पैदा हुआ संकट नहीं था बल्कि इसकी शुरुआत पहले हो चुकी थी। इन आंकड़ों को थोड़ा विस्तार से समझ लेते हैं। 2009 में 12.56 लाख नौकरियां मिली थीं। 2010 में नई नौकरियां मिलीं 8.65 लाख। फिर 2011 में नई नौकरियों के मिलने आंकड़ा रहा 9.30 लाख। उसके बाद 2012 में 3.22 लाख नए रोजगार के मौके बने। 2013 में नई नौकरियों का आंकड़ा रहा 4.19 लाख। यानी यूपीए के शासनकाल में 2009 में 12.56 लाख नौकरियों से 2013 में सालाना रोजगार का आंकड़ा घटकर आ गया था 4.19 लाख। इस लिहाज से 2014 का आंकड़ा नौकरियों में हुई किसी अप्रत्याशित गिरावट को नहीं दिखाता है। दरअसल इन आंकड़ों को विस्तार से समझाना इसीलिए मैंने जरूरी समझा कि इससे देश में लगातार घटते रोजगार की मुश्किल अच्छे से समझ में आती है और ये मुश्किल सिर्फ भारत की नहीं है।

दुनिया भर में मशीनीकरण ने रोजगार के मौके कम किए हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे कम आबादी वाले देश भी रोजगार के नए मौके की मुश्किल से जूझ रहे हैं। इसी साल जुलाई में हुए सर्वे में सबसे ज्यादा लोगों को आर्थिक मामले में रोजगार की ही मुश्किल सबसे बड़ी दिखी। अमेरिका जैसे विकसित देश में जहां बेरोजगार लोगों को सरकार सहायता देती है, बेरोजगारी बड़ी मुश्किल बन गई है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ती बेरोजगारी कितनी बड़ी मुश्किल है, इसका अन्दाजा ताजा आंकड़े से लगता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कुल उत्पादन का 70 प्रतिशत निजी खपत और बेरोजगारों को मिलने वाली सरकारी मदद में चला जा रहा है। लेकिन, सरकारी मदद के बावजूद बेरोजगार पहले से बहुत कम खर्च कर पा रहे हैं। और आयकर की वसूली पर भी उसका असर पड़ा है। इस लिहाज से घटते रोजगार के दौर में भारत की स्थिति समझने की कोशिश करते हैं। अप्रैल से जुलाई की तिमाही के दौरान डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 19 प्रतिशत बढ़ा है। प्रत्यक्ष कर वसूली बढ़कर 1.90 लाख करोड़ रहा है। कॉर्पोरेट टैक्स 7.2 प्रतिशत बढ़ा है जबकि, लोगों का पर्सनल इनकम टैक्स 17.5 प्रतिशत बढ़ा है। 2.83 करोड़ टैक्स रिटर्न भरे गए हैं। यह पिछले साल से 24.7 प्रतिशत ज्यादा है। पिछले साल 2.27 करोड़ टैक्स रिटर्न भरा गया था। इसकी सबसे बड़ी वजह 500 और 1000 के नोटों का बन्द होना और जीएसटी का लागू होना है। यह दोनों बात मोदी सरकार के साथ सरकार के आलोचक भी कह रहे हैं। लेकिन, फिर आलोचक सवाल खड़ा करते हैं कि नोटबन्दी सफल होने का कोई आंकड़ा नहीं मिल रहा। हालांकि, इसका जवाब भी प्रधानमंत्री ने लाल किले से दिया कि 3 लाख करोड़ से ज्यादा की रकम सिस्टम में वापस आई है। दूसरा आलोचक जीएसटी को भी असफल बता रहे हैं। 2016-17 में डायरेक्ट टैक्स 14.5 प्रतिशत बढ़कर 8,49,818 करोड़ रहा। जाहिर है, 2017-18 के आंकड़े पिछले साल से काफी बेहतर होंगे। क्या सिर्फ जीएसटी और नोटबन्दी की ही वजह से टैक्स भरने वाले बढ़ रहे हैं ? क्योंकि, रोजगार के आंकड़े तो लगातार गिरने की बात की जा रही है! द वायर पर लेख में प्रेम शंकर झा लिखते हैं कि “बेरोजगारी बढ़ी है और उद्योगों को नुकसान हुआ है लेकिन, मोदी सरकार आंकड़ों की बाजीगरी के जरिये आर्थिक तरक्की का भ्रम दिखा रही है।”

श्रम मंत्रालय के 8 क्षेत्रों में रोजगार के आंकड़ों के आधार पर कहना कि मोदी सरकार में रोजगार घटा है, 2009 के बाद से सही प्रतीत होता है। लेकिन, पर्सनल इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स के बढ़े आंकड़े इतना तो तय कर रहे हैं कि अर्थव्यवस्था ऐसी भी खराब नहीं है, जैसी आशंका सामान्य तौर पर जताई जा रही है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही घटते रोजगार की समस्या अच्छे से पता थी। यूपीए के शासनकाल में ही 12.56 लाख से 4.19 लाख रोजगार इसकी गवाही दे रहे थे। इसीलिए नरेंद्र मोदी ने उस रास्ते को पकड़ा जिसकी तरफ लम्बे समय से बड़े विद्वान इशारा कर रहे थे। बड़े कॉर्पोरेट्स देश की जीडीपी बढ़ा सकते हैं लेकिन, रोजगार के साथ तरक्की के लिए छोटे और मंझोले उद्योंगो को ही बढ़ाना होगा। नरेंद्र मोदी के लिए छोटे, मंझोले उद्योगों को बढ़ाना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि, बड़े उद्योगों ने पहले ही करोड़ के कर्ज लेकर उनको वापस नहीं किया था। ऐसे में बैंकों के लिए छोटे, मंझोले उद्योगों को कर्ज देने के लिए रकम ही नहीं थी। इसीलिए सरकार बनाने के बाद सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार की तरफ से छोटे, मंझोले उद्योगों को मदद के लिए माइक्रो यूनिट्स फाइनेंस एंड रीडेवलपमेंट एजेंसी लिमिटेड बनाई।

माइक्रो यूनिट्स फाइनेंस एंड रीडेवलपमेंट एजेंसी लिमिटेड यानी मुद्रा योजना के जरिए 2015-16 में 3,48,80,924 लोगों को कर्ज दिया गया। 2015-16 में कुल दिया गया कर्ज 1,32,954 करोड़ रुपए था। 2016-17 में पहले साल से ज्यादा 3,97,01,047 लोगों को कर्ज दिया गया। इस साल करीब 4 करोड़ लोगों को दिया गया कुल कर्ज 1,75,312 करोड़ रुपए रहा। चालू वित्तीय वर्ष की बात करें, तो अब तक 1,31,40,163 लोगों को कर्ज दिया गया है। इन लोगों को 60000 करोड़ रुपए से ज्यादा कर्ज मन्जूर किया गया, जिसमें से 57,308 करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज दिया जा चुका है। मुद्रा योजना के तहत दिए गए कर्ज की सबसे अच्छी बात ये है कि उन लोगों को आसानी से कर्ज मिल पा रहा है, जिनको कर्ज देने के लिए बैंकिंग सिस्टम तैयार नहीं दिखता। नए कारोबारी, महिलाओं के लिए बैंकों से कर्ज लेना सबसे बड़ी मुश्किल रहा है। मुद्रा योजना के आंकड़े बताते हैं कि इन लोगों की मुश्किल आसान हुई है। मुद्रा योजना शुरू होने के साल में कुल दिए गए कर्ज में से 36 प्रतिशत यानी एक तिहाई से ज्यादा नए उद्यमियों को ही मिला। दूसरा अच्छा पहलू ये कि इसका लाभ लेने वालों में 80 प्रतिशत महिलाएं हैं।

अब इतना तो आसानी से माना जा सकता है कि 2016-17 में जिन 4 करोड़ लोगों को मुद्रा योजना के तहत कर्ज दिया गया, उन लोगों की आमदनी मजदूरों और खेती के क्षेत्र में अप्रत्यक्ष बेरोजगारी में फंसे लोगों से बेहतर हुई होगी। इस साल भी अभी तक 1,31,40,163 लोगों को अपना रोजगार शुरू करने के लिए कर्ज दिया गया है। छोटे और मंझोले उद्योगों को, खासकर 3-4 लोगों में काम करने वाली छोटी-छोटी इकाइयों के जरिए ही भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में बेरोजगारी से लड़ा जा सकता है। सरकारी रोजगार के आंकड़ों में निश्चित तौर पर बेरोजगारी बढ़ी है और बढ़ने वाली है। इस पर आर्थिक विद्वानों की चिन्ता एकदम जायज है। लेकिन, दूसरे क्षेत्रों में नौकरियां बन रही हैं, मौके बन रहे हैं। आईटी क्षेत्र के संगठन नैस्कॉम के ताजा आंकड़े के मुताबिक, 2016-17 में 1.7 लाख नई नौकरियां मिली हैं। अगर मोदी सरकार के 3 साल में आईटी क्षेत्र में नई नौकरियों का आंकड़ा देखें, तो यह 6 लाख का है। टीमलीज एनालिसिस का सर्वे बता रहा है कि अक्टूबर 2016 से मार्च 2017 के बीच पहले के 6 महीने से 4 प्रतिशत ज्यादा मौके बने हैं। इसी सर्वे से पता चला है कि 2016 में ई कॉमर्स और टेक्नोलॉजी स्टार्टअप में करीब 1 लाख नई नौकरियां मिली हैं। और 2017 में भी जॉब ग्रोथ के लिहाज से पॉजिटिव है। डिजिटल इंडिया किस तरह से रोजगार के मौके पकड़ सकता है, इसका अन्दाजा नैस्कॉम की उस रिपोर्ट से समझ में आता है, जिसमें बताया गया है कि 2025 तक दुनिया की फॉर्च्यून 500 कम्पनियों में से आधी कंम्पनियों का मुख्यालय भारत में होगा। मेक इन इंडिया की सफलता का अन्दाजा लगाने के लिए ये आंकड़ा काफी है कि पिछले 30 महीने में 72 नई मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगी है। इन 72 कम्पनियों में सीधे तौर पर एक लाख और उससे जुड़े करीब 3 लाख रोजगार मिले हैं। निश्चित तौर पर सरकारी नौकरियों या उससे जुड़े क्षेत्रों में नौकरियों के मौके घटे हैं। बड़ी कम्पनियों में भी नौकरियां घट रही हैं। लेकिन, इस आधार पर तरक्की रफ्तार को खारिज करने वाली अर्थशास्त्री छोटे और मंझोले उद्योग में नए रोजगार के मौके नहीं देखना चाह रहे हैं। इसीलिए जॉबलेस ग्रोथ जैसा जुमला आसानी से फिट हो जाता है। हां, इतना जरूर है कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती मुद्रा या दूसरी योजनाओं के जरिए छोटे, मंझोले उद्योगों को दिए कर्ज को सही से लागू कराने में होगी। क्योंकि, यह अगर टूटा तो मुश्किल हो सकती है।

लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

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